Tuesday, April 5, 2011

कबीर के दोहे 4

चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोय
दो पाटन के बीच में बाकी बचा ना कोय || 61 ||
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कबीरा सीप समुद्र की खारा जल नहीं ले
पानी पिये स्वाती का, शोभा सागर दे || 62 ||
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सतगुरु मिला तो सब मिले, ना तो मिला ना कोय
मात पिता सुत बान्धवा ये तो घर घर होय || 63 ||



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चिन्ता तो गुरु नाम की और ना चितवे दास
जो कोई चितवे नाम बिनु सोइ काल की आस || 64 ||
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कथा हु कहत जात हूं, कहत बजाय ढोल
स्वास खाली जात है तीन लोक का मोल || 65 ||
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दास बनना कठिन है मैं दासन का दास
अब तो ऐसा होय रहूं पांव तले की आस || 66 ||
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विषय त्याग बैराग्य है, समता कहिये ज्ञान
सुखदायी सब जीव को, यही भक्ति परमान || 67 ||
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भक्ति महल बहु ऊंच है, दूर ही से दरशाय
जो कोई जन भक्ति करे, शाभा बरनी ना जाय || 68 ||
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कबीरा ये संसार है, जैसा सेमल फूल
दिन दस के व्यवहार में झूंठे रंग ना भूल || 69 ||
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एक दिन ऐसा आयेगा, सबसे पडे बिछोह
राजा रानी राव रंक सवध क्यों नाही होय || 70 ||
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जैसे भक्ति करे सबी, वैसे पूजा होय
भय पलट है जीव को, निर्भय होय ना कोय || 71 ||
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शब्द बराबर धन नहीं जो कोई जाने बोल
हीरा तो दामों मिले, शब्द मोल ना तोल || 72 ||
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राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट
अंतकाल पछतायेगा, जब प्राण जायेंगे छूट || 73 ||
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नींद निशानी मौत की, उठ कबीरा जाग
और रसायन छाडी के नाम रसायन लाग || 74 ||
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कबीर का दोहे 3

काला नाला हीन जल, सो फिर पानी होय
जो पानी मोती भया, सो फिर नीर होय || 41 ||

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कामी तारे क्रोधी तारे, लोभी की गति होय
सलिल भक्त संसार में, तरत देखा कोय || 42 ||

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तन मन लज्जा ना करे, काम बाण उर शाल
एक काम सब बस किये, सुर नर मुनि बेहाल || 43 ||
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घर जाये घर ऊभरे, घर राखे घर जाय
एक अचम्भा देखिया, मुआ काल तो खाय || 44 ||

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कबीरा यह गति अटपटी चटपटी लखी ना जाय
जो मन की खटपट मिटे अधर भया ठहराय || 45 ||

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सेवक सेवा में रहे, सेवक कहिये सोय
कहे कबीरा बावला सेवक कभी ना होय || 46 ||
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सतगुरु मिला जो जानिये, ज्ञान उजाला होय
भरम का भंडा तोडकर रहे निराला होय || 47 ||
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बंधे को बंधे मिले, छूटे कौन उपाय
जो मिले निरबन्ध को, पल में ले छुडाय || 48 ||

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कबीर लहरे समुद्र की मोती बिखरे आय
बगुला परख जान ही, हंसा चुन चुन खाय || 49 ||

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कबीरा दर्शन साधु के, करण कीजे हानि
जो उद्यम से लक्ष्मी की, आलस मान हानि || 50 ||
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साधु शब्द समुद्र हैं जा में रतन भराय
मन्द भाग मुट्ठी भर कंकड हाथ लगाय || 51 ||

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साधु भूखा भाव का, धन का भूखा नाही
धन का भूखा जो फिरे सो तो साधु नाही || 52 ||
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भॆष देख ना पूछिये, पूछ लीजिये ज्ञान
बिना कसौटी होत नाही, कंचन की पहचान || 53 ||
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कस्तुरी कुंडल बसे, मृग ढूंढे बन माही
ज्यों घट घट राम है, दुनियां देखे नाही || 54 ||
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कोयला भि हो उजला, जरी पाडी जो सेक
मूर्ख होय उजला, जो काला का खेत || 55 ||
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कबीरा तेरी झोंपडी, गल कटियां के पास
जैसी करणी वैसी भरणी, तू क्यू भया उदास || 56 ||
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करता रहा सो क्यों रहा, अब करी क्यों पछताय
बोये पेड बबूल का तो आम कहां से पाय || 57 ||

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कबीरा गर्व ना कीजिये, कबहूं ना हंसिये कोय
अज ये नाव समुद्र में ना जाने क्या होय || 58 ||

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माटी कहे कुम्हार को तू क्या रौंदे मोय
एक दिन ऐसा आयेगा, मैं रौंदूंगी तोय || 59 ||
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आये है सो जायेंगे, राजा रंक फकीर
एक सिंहासन चढी चले, दूजा बंधे जंजीर || 60 ||